कहते है वक्त के साथ बदलना ही जिंदगी है और वक्त के साथ चलने की मेरी कोशिश जारी है I २००८ में पहली बार जब में चंडीगढ़ आया तो में सोचा की बी.ए के बाद की पढ़ाई में चंडीगढ़ के किसी अच्छे से कॉलेज से करूँगा,क्यो कि चंडीगढ़ में पत्रकारिता से संबंधित बहुत कम कॉलेज थे परन्तु मेने ठान लिया था I इसलिए मैंने २००९ में चितकारा विश्वविधालय में दाख़िला ले लिया.क्यों की यह मेरे लिए एक तरह से नया अनुभव था, तो में काफी उत्सुक था,परन्तु धीरे-धीरे समय बीतने के साथ यह उत्सुकता थोड़ी कम होती गयी,क्यों की इस नए मोहोल में, में अपने आप को पूरी तरह से व्यवस्थित नहीं कर पाया,और कही कही ना कही यह टीश मुझे रह रह कर आज भी कचोती है I
दरअसल में जिस तरह के माहोल में पला-बड़ा हुआ वहां के मुताबिक यहाँ परिसिथिया बहुत हद तक अलग थी I जो की बहुत हद तक वर्तमान परिसिथियो से बहतर थी क्यों यहाँ जो सबसे बड़ी मुझे खामी लगी वो थी लोगो की एक दूसरे के प्रति कोई परवाह ना करना चाहे एक मनुष्य चोराहे पर दम थोड दे,लेकिन शायद ही कोई ज़हमत उठा कर हॉस्पिटल ले जाये I आज इंसानियत शायद आज मौत के दरवाज़े पर दस्तक दे चुकी है हालाँकि गाँव में यह जो दिलचस्प बात थी,परन्तु यह धीरे-धीरे वहा भी दम तोड़ती नज़र आ रही है लेकिन पूरी तरह से नहीं I मुझे आज भी याद है जब में बी.ए की पढ़ा करता था तो पड़ोस में एक वृद्ध महिला की मौत हो गयी लेकिन हमें इस बात का पता १३ दिन बाद पता चला जब तेरहवी पर उस महिला के घर पर हमने चहल-पहल देखी इ और यह देख कर मुझे बड़ी हैरानी हुई I

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